गनगौर (गौरी तृतीया) (चैत्र शुक्ल तृतीया)
होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से कुमारी और विवाहित लडकियां अर्थात नवविवाहिताएं प्रतिदिन गनगौर पूजती हैं। वे चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पजी हई गनगौरों को पानी पिलाती हैं। फिर दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं।
गनगौर व्रत भारतीय हिंदू स्त्रियों का त्यौहार है। इस दिन सधवा स्त्रियां व्रत करती हैं। यह व्रत विवाहिता लड़कियों के लिए पति का अनुराग उत्पन्न करने वाला और कुमारियों को उत्तम पति देने वाला है। इससे सुहागिनों का सुहाग अखण्ड रहता है। यही कारण है कि हिंदू स्त्री समाज में यह दिन एक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
गौरी पूजन का यह त्यौहार भारत के सभी प्रांतों में थोड़े-बहुत नाम भेद से पूर्ण धूमधाम के साथ मनाया जाता है। राजस्थान का तो यह अत्यंत विशिष्ट त्यौहार है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीजी को तथा पार्वतीजी ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था।
इस दिन स्त्रियां संदर वस्त्र और आभूषण धारण करती हैं। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। व्रत धारण करने से पूर्व रेणुका गौरी की स्थापना करती हैं। इसके लिए घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौडी और चौबीस अंगल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दी, चदन, कपूर, केसर आदि से उस पर चौक पूरा जाता है। फिर उस पर बालू से गारी अर्थात पार्वती बनाकर (स्थापना करके) इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुए-कांच की चूडियां, महावर, सिंदर, रोली, मेहन्दी, टीका, बिंदी, कंघा, शीशा, काजल आदि चढ़ाया जाता है।
चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से गौरी का विधिपूर्वक पूजन करके सुहाग की इस सामग्री का अर्पण किया जाता है। फिर भोग लगाने के बाद गाराजी की कथा कही जाती है। कथा के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से माहलाएं अपनी मांग भरती हैं। गौरीजी का पूजन दोपहर को होता है। इसके पश्चात केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गौर का प्रसाद पुरुषों के लिए निषिद्ध है।
गनगौर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाए जाते हैं। लड़की की शादी बाद लड़की पहली बार गनगौर अपने मायके में मनाती है और इन गनों त सास के कपड़ों का बायना निकालकर ससुराल में भेजती है। यह विवाह के प्रथम वर्ष में ही होता है, बाद में प्रतिवर्ष गनगौर लड़की अपनी ससुराल में ही मनाती है।
ससुराल में भी वह गनगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को बायना, कपड़े तथा सुहाग का सारा सामान देती है। साथ ही सोलह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण शृंगार की वस्तुएं और दक्षिणा दी जाती है। गनगौर पूजन के समय स्त्रियां गौरीजी की कथा भी कहती हैं।
कथा एक बार भगवान शंकर, पार्वतीजी तथा नारदजी के साथ पृथ्वी पर भ्रमणार्थ निकले। चलते-चलते तीनों एक गांव में पहुंचे। उस दिन चैत्र शुक्ल तृतीया थी। जब गांव वालों ने सुना कि भगवान शंकर, पार्वतीजी सहित पधारे हैं तो उनके आगमन का समाचार सुनकर गांव की कुलीन स्त्रियां स्वागत के लिए स्वादिष्ट और रुचिकर भोजन बनाने लगीं। भोजन की तैयारी में उन्हें देर हो गई।
किंतु साधारण कुल की स्त्रियां जैसे बैठी थीं वैसे ही थाली में हल्दी-चावल तथा जल लेकर दौड़ी हुई शिव-पार्वती के पूजन हेतु उनके पास पहंच गईं। पार्वतीजी ने उनके पजा भाव को स्वीकार कर उनकी भक्ति रूपी वस्तुओं को स्वीकार कर उनके ऊपर सारा सुहाग रस छिड़क दिया। वे अटल सौभाग्य प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं।।
तत्पश्चात उच्च कुल (कुलीन) की स्त्रियां सोलह श्रृंगार और आभूषणों से सजी हुई, अनेक प्रकार के पकवान और पूजा की सामग्री लेकर गौरी और शंकरजी की पूजा करने पहुंची। सोने-चांदी से निर्मित उनकी थालियों में विभिन्न प्रकार के पदार्थ सजे हुए थे।
उन्हें देखकर शिवजी ने शंका व्यक्त करते हुए पार्वतीजी से कहा-‘देवी! तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों में बांट दिया, अब इन्हें क्या दोगी?’
पार्वतीजी ने कहा-‘भगवन! आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को तो मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा। परन्तु इनको (कुलीन स्त्रियों) अपनी उंगली चीरकर अपने रक्त रस का सुहाग दूंगी। यह सुहाग रस जिसकी मांग में पड़ेगा वह मेरे समान ही तन-मन से सौभाग्यवती हो जाएगी।’
जब कुलीन स्त्रियां पूजन कर चुकी तो पार्वतीजी ने अपनी उंगली चीरकर उन पर छिड़की। जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसने वैसा ही सहाग पाया। पार्वतीजी ने कहा तुम लोग वस्त्राभूषणों का परित्याग कर माया-मोह से रहित तन-मनधन से पति सेवा करना। अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। पार्वतीजी के यह गईं। आशीर्वचन सुनकर उन्हें प्रणाम करके कुलीन स्त्रियां अपने-अपने घर लौट इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू के महादेव बनाकर उनका पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बाल के ही पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया। इसके बाद प्रदक्षिणा करके. नदी तट की मिट्टी से माथे पर टीका लगाकर, बालू के दो कणों का प्रसाद पाया और शिवजी के पास वापस लौट आई।
इस सब पूजन आदि में पार्वतीजी को नदी किनारे बहुत देर हो गई थी। अत: महादेवजी ने उनसे देरी से आने का कारण पूछा। इस पर पार्वतीजी ने कहा-‘वहां मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे, उन्हीं से बातें करने में देरी हो गई।’
परन्तु भगवान तो आखिर भगवान थे। वे शायद कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अत: उन्होंने पूछा-‘तुमने पूजन करके किस चीज का भोग लगाया और क्या प्रसाद पाया?’
पार्वतीजी ने उत्तर दिया-‘मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे ही खाकर मैं सीधी यहां चली आ रही हूं।’ यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने के लालच में नदी-तट की ओर चल पड़े। पार्वतीजी दुविधा में पड़ गईं।
उन्होंने सोचा कि अब सारी पोल खुल जाएगी। अत: उन्होंने मौन-भाव से शिवजी का ध्यान करके प्रार्थना की, ‘हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो आप ही इस समय मेरी लाज रखिए।’
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पार्वतीजी भी शंकरजी के पीछे-पीछे चलने लगी। अभी वे कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें नदी के तट पर एक सुंदर माया महल दिखाई दिया। जब वे उस महल के भीतर पहुंचे तो वहां देखते हैं कि शिवजी के साले और सलहज आदि सपरिवार मौजद हैं। उन्होंने शंकर-पार्वती का बड़े प्रेम से स्वागत किया।
वे दो दिन तक वहां रहे और उनकी खब मेहमानदारी होती रही। तीसरे दिन जब पार्वतीजी ने शंकरजी से चलने के लिए कहा तो वे तैयार न हुए। व अभी और रुकना चाहते थे। पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दी। तब मजबूर हाकर शंकरजी को पार्वती के साथ चलना पडा। नारदजी भी साथ में चल दिए। तीनों चलते-चलते बहुत दूर निकल गए।
सायंकाल होने के कारण भगवान भास्कर अपने धाम को पधार रहे थे। तब शिवजी अचानक पार्वती से बोले-‘मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भल आया हूं।’
पार्वतीजी बोलीं-‘ठीक है, मैं ले आती हूं।’ किंतु शिवजी ने उन्हें जाने की आज्ञा नहीं दी। इस कार्य के लिए उन्होंने ब्रह्मापुत्र नारदजी को वहां भेज दिया। नारदजी ने वहां जाकर देखा तो उन्हें महल का नामोनिशान तक न दिखा। वहां तो दूर-दूर तक घोर जंगल ही जंगल था।
इस अंधकारपूर्ण डरावने वातावरण को देख नारदजी बहुत ही आश्चर्यचकित हुए। नारदजी वहां भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वह किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? सहसा बिजली चमकी और नारदजी को माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और उसे लेकर भयातुर अवस्था में शीघ्र ही शिवजी के पास आए और शिवजी को अपनी विपत्ति का विवरण कह सुनाया।
इस प्रसंग को सनकर शिवजी ने हंसते हए कहा-‘हे मुनि! आपने जो कुछ दृश्य देखा, वह पार्वती की अनोखी माया है। वे अपने पार्थिव पूजन की बात को आपसे गुप्त रखना चाहती थी, इसलिए उन्होंने झूठ बोला था। फिर उस को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से माया महल की रचना की। अतः सचाई को उभारने के लिए ही मैंने भी माला लाने के लिए तुम्हें दुबारा उस स्थान पर भेजा था।’
इस पर पार्वतीजी बोलीं-‘मैं किस योग्य हूं।’ तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा-‘माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियां आपके नाम का स्मरण करने मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है?
हे माता! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है। जहां तक इनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना को छिपाने का सवाल है। वह भी उचित ही जान पड़ती है क्योंकि पूजा छिपाकर ही करनी चाहिए। आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मझे बहत प्रसन्नता हई है।
मेरा यह आशीर्वचन है-‘जो स्त्रियां इस तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगल कामना करेंगी उन्हें महादेवजी की कपा से दीर्घाय पति का संसर्ग मिलेगा तथा उसकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होगी। फिर आज के दिन आपकी भक्तिभाव से पूजा-आराधना करने वाली स्त्रियों को अटल सौभाग्ययह कहकर नारदजी तो प्रणाम करके देवलोक चले गए और शिवजी-पार्वतीजी कैलाश की ओर चल पड़े। चूंकि पार्वतीजी ने इस व्रत कोकर किया था, उसी परम्परा के अनुसार आज भी स्त्रियां इस व्रत को पुरुषों से छिपाकर करती हैं।
यही कारण है कि अखण्ड सौभाग्य के लिए प्राचीन काल से ही स्त्रियां इस व्रत को करती आ रही हैं।
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